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Tuesday, 9 July 2013

मछली पालन : जल में तैरता मुनाफा

कभी मछली पालन मछुआरों तक ही सीमित था, लेकिन आज यह सफल और प्रतिष्ठित लघु उद्योग के रूप में स्थापित हो रहा है। नई-नई तकनीक ने इस क्षेत्र में क्रांति ला दी है। मछली पालन रोजगार के अवसर तो पैदा करता ही है, खाध पूर्ति में वृद्धि के साथ-साथ विदेशी मुद्रा अर्जित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। एक समय था जब मछलियों को तालाब, नदी, समुद्र के भरोसे रखा जाता था, परन्तु बदलते परिवेश में इसके लिए कृत्रिम जलाशय बनाये जा रहे है, जहां वे सारी सुविधाएं उपलब्ध होती है, जो प्राकृतिक रूप में नदी, तालाब और समुद्र में होती है।
 मछली पालन के लिए सबसे महत्वपूर्ण है तालाब। तालाब का चयन करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। पानी का श्रोत तालाब के समीप हो, ताकि जरुरत पड़ने पर उसे पानी से भरा जा सके। उसमें अनावश्यक चीजें जैसे मेंढक, केंकड़े आदि न हो। तालाब ऐसा होना चाहिए, जिसमें कम से कम 5-6 फुट तक पानी भरा रहे। यदि तालाब में जलीय खरपतवार या पौधे हों तो उन्हें उखाड़ देना चाहिये। खरपतवार नाशक दवा का इस्तेमाल करें। इसके बाद पानी में बारीक़ जाल डाल कर मांसाहारी तथा मिनोज मछलियों को निकाल दें। ये मछलियाँ पाली जाने वाली मछलियों को चट कर जाती है। उसके बाद चुने का छिड़काव करना चाहिए। चुने का यह काम 'लाईमिंग' कहलाता है। 
सामान्यतया सभी मछलियाँ जुलाई-अगस्त में अंडे देती है। जीरा, फ्राय और अन्गुलिकाएं में से किसी भी बीज को अपनाया जा सकता है। मछलियों को रोजाना एक निश्चित समय पर भोजन अवश्य देना चाहिए।
मछली पालन के लिए ऐसी मछलियों को पलना चाहिए जो छोटे-छोटे जलीय जीवाणु खाकर जीवित रहती है और कम समय में तेजी से बढती है। उनमें मुख्यतः कतला, रोहू, मिरगल, कामन कार्प, सिल्वर कार्प, कालवासु,कतरोहू, बाटा और महाशीर है। 


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