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| कल्पना सरोज |
भारत की एक दलित महिला जिसने पक्षपात, गरीबी और शोषण से बचने के लिए आत्महत्या करने की कोशिश की थी, आज करोड़ों की कंपनी की मालकिन है।
यह कहानी है कल्पना सरोज की जिसका जन्म गरीब दलित परिवार में हुआ, स्कूल में सताया गया, 12 साल की उम्र शादी हो गयी। कल्पना बताती है "जब पहली बार मुंबई आई तो मुझे नहीं मालूम था की मै कहाँ जाऊ। मै एक छोटे से गाँव से थी, आज इस शहर की दो सड़कों के नाम मेरी कंपनी के नाम पर रखे गए है।" भारत में छोटी जाती में पैदा होने वालो को पक्षपात का सामना करना पड़ा है।
वे कहती है "मेरे बहुत से दोस्तों के अभिभावक मुझे अपने घरों में नहीं घुसने देते थे और मुझे स्कूल की कई गतिविधियों में भाग नहीं लेने नहीं दिया जाता था क्योकि मैं दलित थी। मुझे बहुत गुस्सा आता था, मुझे लगता था की मै भी तो इंसान हुं।" हालांकि उनके पिता ने उन्हें पढ़ने की इजाजत दी लेकिन पारिवारिक दवाबों के कारण 12 साल की उम्र में ही उनकी शादी हो गयी। अपने 10 साल बड़े पति के साथ वे मुंबई आ गयी जहां एक झुग्गी में रहने पर उन्हें बहुत बड़ा झटका लगा। वे बताती है "पति के बड़े भाई और भाभी मेरे साथ बुरा सलूक करते थे, वे मेरे बालों को नोचते थे और पीटते थे। कई बार छोटी-छोटी बातों को लेकर मै इस शारीरिक और मानसिक शोषण से टूट गयी थी।"
एक बार जब मिलने के लिए कल्पना के पिता आये तो फटे कपड़े पहने बेटी की ऐसी हालत देख दंग रह गए और उसे घर ले गए। कल्पना को एक नाकाम औरत मानते हुए गाँव में बहुत सारे लोग उसके घर वापस आने पर शक की निगाह से देखने लगे। लेकिन यह सबकुछ नजरअंदाज करते हुए कल्पना ने पैसा कमाने के लिए सिलाई सीखी, लेकिन आर्थिक आजादी के बावजूद उनपर बहुत अधिक दबाव था।
कल्पना ने अपने सबसे कमजोर क्षण के बारे में बताया "एक दिन मैंने अपनी जिंदगी ख़त्म करने का फैसला कर लिया, मैंने एक कीटनाशक दवा की तीन बोतलें पी ली।" लेकिन कल्पना के मुंह से झाग और उसे बुरी तरह से कांपती देख उसकी एक आंटी ने उसे बचा लिया। इस घटना ने उसका जीवन बदल दिया। वे कहती है "मैंने फैसला किया की मैं मरने से पहले जिंदगी में कुछ बड़ा करूंगी।"
16 साल की उम्र में वे एक अंकल के पास वापस मुंबई चली गयी और दर्जी का काम करने लगी। शुरू में उसे एक दिन में 50 रूपये से भी कम मिलते थे लेकिन फिर उसने औधोगिक सिलाई मशीन चलानी सीखी जिससे उसके आय में बढ़ोतरी हुई। लेकिन इतने पैसे में कल्पना की बहन का इलाज नहीं हो सकता था जो बीमार थी। यह क्षण कल्पना के उद्यमी स्वभाव को परिभाषित करने वाला था। वे बताती है "मैं बहुत निराश हुई और मुझे अहसास हुआ की जिंदगी में पैसा बहुत मायने रखता है और मुझे और कमाने की जरुरत है।" उन्होंने फर्नीचर का व्यापार करने और सिलाई के काम को बढ़ाने के लिए सरकारी ऋण लिया। उसने दिन में 16 घंटे काम किया जो वो आज तक भी करती है।
बाद में कल्पना ने एक व्यापारी से शादी कर ली और उनके दो बच्चे है। अपनी पहचान बना चुकी कल्पना को कमानी ट्यूब्स नाम की कंपनी चलाने का मौका मिला जो कर्ज में थी। लेकिन कल्पना ने नवीनीकरण करते हुए कंपनी की हालत बदल दी। वे कहती है "मै यहां काम करने वालो को न्याय दिलाना चाहती थी, मै कर्मचारियों की स्थिति समझ सकती थी जो अपने परिवार के लिए भोजन जुटाना चाहते थे।" आज कमानी ट्यूब्स 500 करोड़ रूपये से अधिक मूल्य की एक बढ़ती हुई कंपनी है।

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